सिंह लग्न की संपूर्ण जानकारी

सिंह लग्न की संपूर्ण जानकारी

सिंह लग्न वाले जातक के गुण

सिंह लग्न वाले जातक गतिशील और आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक होते हैं। वे महत्वाकांक्षी, साहसी, मजबूत इच्छाशक्ति, सकारात्मक, स्वतंत्र और आत्म विश्वास से ओतप्रोत होते हैं। हलांकि वे कभी-कभी किसी बात पर दुखी होने पर आक्रामक हो जाते हैं। सिंह लग्न के लोग सहज, खुश रहने वाले बुद्धिमान और खुले विचार वाले होते हैं। वे धर्म में रूढ़िवादी सिद्धांतों का पालन करते है लेकिन दूसरे के उपदेशों के प्रति संवदेनशील भी होते हैं।

सिंह लग्न वाले जातक आनंद से जीवन ब्यतीत करने वाले रिपुओं और बिरोधियों पर विजय प्राप्त करने वाले होते हैं। स्पष्टवादी होते हुए आप निष्कपट और मनसा वाचा से पवित्रता पालन करने वाले होंगें। ऐसे लोग खरी-खरी बात करने वाले सरल व्यक्ति होते हैं, जिन्हें अच्छी तरह पता होता है कि उन्हें क्या चाहिए और वे उसे पाने के लिए रचनात्मक तरीके का प्रयोग करते हैं। नीच कर्म से घृणा करने वाले धैर्यवान और उदार तथा आप जिस कार्य को करेंगे उसको पूरी ईमानदारी तथा निपुणता से करेंगे।

आप अपनी मर्यादा के पालन में सर्बदा तत्पर रहेंगें। आपके रहन-सहन से बड़प्पन प्रतीत होगा मित्रता में अटल तथा विश्वास पात्र होंगें। आप केवल दयालु ही नहीं बल्कि सत्पात्र की रक्षा में भी तत्पर रहेंगे। दुःख के समय में आप अपनी सूझ-बूझ को काम में लाकर दुःख के निवारण में समर्थ होंगे। आपको अपने उद्यम और परिश्रम का फल पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं होगा। लोगों पर आपके गुणों का प्रभाव विशेष रूप से पड़ता है। आप अपने गुणों तथा साहस से बिघ्न बाधाओं का शीघ्र निपटारा कर सकते हैं।

सिंह लग्न में ग्रहों के प्रभाव

सिंह लग्न में सूर्य ग्रह का प्रभाव

लग्नेश होने के कारण सूर्य देवता इस लग्न कुंडली में सबसे योग करक ग्रह होते है। पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दशम, एकादश भाव में सूर्य देवता अपनी दशा-अंतर्दशा में अपनी क्षमतानुसार शुभ फल देतें है। तीसरे (नीच), छठें, आठवें और द्वादश भाव में सूर्य देवता अशुभ हो जातें है। उनका दान और पाठ करके उनकी अशुभता को कम किया जाता है। शुभ भावों में सूर्य का रत्न माणिक पहन कर सूर्य देवता का बल बढ़ाया जाता है।

सिंह लग्न में बुध ग्रह का प्रभाव

बुध देवता इस लग्न कुंडली में दूसरे और एकादश भाव के मालिक हैं। लग्नेश सूर्य के अतिमित्र होने के कारण बुध देवता इस लग्न कुंडली में योग करक ग्रह माने जाते हैं। पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दशम और एकादश भाव में बुध देवता अपनी दशा-अंतर्दशा में शुभ फल देतें है। तीसरे, छठें, आठवें और बारहवें भाव में बुध देवता अशुभ फल देते हैं। उनका दान-पाठ करके बुध ग्रह के अशुभ प्रभाव को कम किया जाता है।

सिंह लग्न में शुक्र ग्रह का प्रभाव

इस लग्न कुंडली में शुक्र देवता तीसरे और दसम भाव के मालिक हैं। सूर्य देवता के विरोधी दल के होने के कारण वह कुंडली के सम ग्रह माने जाते हैं। पहले, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दसम और एकादश भाव में शुक्र देवता अपनी दशा-अंतर्दशा में अपनी क्षमता अनुसार शुभ फल देते हैं। दूसरे (नीच), तीसरे, छठें, आठवें, व द्वादश भाव में शुक्र देवता अशुभ हो जाते हैं। दान व पाठ करके शुक्र देवता की अशुभता को कम किया जाता है।

सिंह लग्न में मंगल ग्रह का प्रभाव

मंगल देवता इस लग्न कुंडली में चौथे व नवमें, दो अच्छे भावों के स्वामी होते हैं। लग्नेश सूर्य के अति प्रिय मित्र होने के कारण मंगल ग्रह इस कुंडली के योगकारक ग्रह माने जाते हैं। पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दशम और एकादश भाव में मंगल देवता अपनी दशा-अंतर्दशा में अपनी क्षमतानुसार शुभ फल देते हैं। तीसरे, छठें, आठवें और द्वादश भाव में पड़े मंगल अशुभ हो जाते हैं। उनकी अशुभता दान पाठ करके दूर की जाती है। अस्त अवस्था में किसी भाव में स्थित मंगल का रत्न मूंगा पहनकर उनका बल बढ़ाया जाता है।

सिंह लग्न में बृहस्पति ग्रह का प्रभाव

बृहस्पति देवता इस लग्न कुंडली में पांचवें और आठवें भाव के स्वामी हैं। सूर्य देवता के मित्र होने के कारण बृहस्पति योगकारक ग्रह माने जाते हैं। पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दशम और एकादश भाव में बृहस्पति देवता अपनी दशा-अंतर्दशा में क्षमता अनुसार शुभ फल देतें हैं। तीसरे, छठे, आठवें और द्वादश भाव में उदय अवस्था में पड़े बृहस्पति देव मारक बन जातें है और अशुभ फल देते है। अस्त अवस्था में बृहस्पति का रत्न पुखराज पहनकर उन्हें मजबूत किया जाता है।

सिंह लग्न में शनि ग्रह का प्रभाव

शनि देव इस लग्न कुंडली में छठे और सातवें भाव के स्वामी हैं। लग्नेश सूर्य के शत्रु होने के कारण शनि देव को कुंडली का अति मारक ग्रह माना जाता है। कुंडली के सभी भावों में शनि देव अशुभ फल देंगे इसलिए उनकी दशा-अंतर्दशा में उनका पाठ और दान करके उनकी अशुभता दूर की जाती है। छठे, आठवें, और बारहवें भाव में शनि देव विपरीत राजयोग में आकर शुभ फल देने की क्षमता रखते हैं परन्तु सूर्य देव के बलि होना अति अनिवार्य है। शनि देव का रत्न इस लग्न कुंडली में नहीं पहना जाता है क्योंक वह रोगेष एवं मारकेश है।

सिंह लग्न में चन्द्र ग्रह का प्रभाव

चंद्र देव इस लग्न कुंडली में द्वादश भाव के मालिक हैं इसलिए इस कुंडली में चंद्र देवता अतिमारक ग्रह माने जाते हैं। कुंडली के किसी भाव में चंद्र देव अपनी दशा-अंतर्दशा में अपनी क्षमतानुसार अशुभ फल देते हैं। छठे, आठवें और बारहवें भाव में पड़े चंद्र देवता विपरीत राज़योग में आकर शुभ फल देने की क्षमता रखते हैं परन्तु सूर्य देव के बलि व शुभ होना अनिवार्य है। इस लग्न कुंडली में मोती चन्द्रमा का रत्न कभी भी नहीं पहना जाता है। चन्द्रमा के दान और पाठ करके उनका अशुभ प्रभाव को कम किया जाता है।

सिंह लग्न में राहु ग्रह का प्रभाव

राहु द्वितीय भाव का अधिपति होकर जातक के कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

सिंह लग्न में केतु ग्रह का प्रभाव

केतु अष्टम भाव का अधिपति होकर जातक के व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

सिंह लग्न में ग्रहों की स्तिथि

सिंह लग्न में योग कारक ग्रह (शुभ-मित्र ग्रह)

सूर्य 1 भाव का स्वामी

मंगल देव 4, 9, भाव का स्वामी

बृहस्पति  5, भाव, 8, भाव का स्वामी

बुध देव 2, भाव 11, भाव का स्वामी

सिंह लग्न में मारक ग्रह (शत्रु ग्रह)

शनि देव 6, भाव 7, भाव का स्वामी

चन्द्र देव 12 भाव का स्वामी

सिंह लग्न में सम ग्रह

शुक्र देव 3, 10, भाव का स्वामी

सिंह लग्न में ग्रहों का फल

सिंह लग्न में सूर्य ग्रह का फल

लग्नेश होने के कारण सूर्य देवता इस लग्न कुंडली में सबसे योग करक ग्रह माने जातें है।

पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दशम, एकादश भाव में सूर्य देवता अपनी दशा – अन्तरा में अपनी क्षमतानुसार शुभ फल देतें है।

तीसरे (नीच ), छठें, आठवें और द्वादश भाव में सूर्य देवता अशुभ हो जातें है। उनका दान और पाठ करके उनकी अशुभता को कम किया जाता है।

शुभ भावों में सूर्य का रत्न माणिक पहन कर सूर्य देवता का बल बढ़ाया जाता है।

सिंह लग्न में बुध ग्रह का फल

बुध देवता इस लग्न कुंडली में दूसरे और एकादश भाव के मालिक हैं। लग्नेश सूर्य के अति मित्र होने के कारण बुध देवता इस लग्न कुंडली में योग करक ग्रह माने जाते हैं।

पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दशम और एकादश भाव में बुध देवता अपनी दशा -अन्तरा में शुभ फल देतें है।

तीसरे, छठें, आठवें और 12वें भाव में बुध देवता मारक ग्रह माने जाते हैं। उनका दान-पाठ करके बुध ग्रह के मारकेत्व को कम किया जाता है।

कुंडली के किसी भी भाव में बुध देव, सूर्य देव के साथ बैठकर अस्त अवस्था में आ जाते हैं तो उनका रत्न पन्ना पहन कर बुध देवता का बल बढ़ाया जाता है।

सिंह लग्न में शुक्र ग्रह का फल

इस लग्न कुंडली में शुक्र देवता तीसरे और दसम भाव के मालिक हैं। सूर्य देवता के विरोधी दल के होने के कारण वह कुंडली के सम ग्रह बन जाते हैं।

पहले, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दसम और एकादश भाव में शुक्र देवता अपनी दशा -अन्तरा में अपनी क्षमता अनुसार शुभ फल देते हैं।

दूसरे (नीच ), तीसरे, छठें, आठवें, व द्वादश भाव में शुक्र देवता अशुभ हो जाते हैं। दान व पाठ करके शुक्र देवता की अशुभता को दूर की जाती है।

शुक्र देवता इस लग्न कुंडली में किसी भी भाव में अगर अस्त अवस्था में है तो उनकी दशा-अन्तरा में कामकाज की वृद्धि के लिए उनका रत्न हीरा, ओपल पहनकर शुक्र देवता का बल बढ़ाया जाता है

सिंह लग्न में मंगल ग्रह का फल

मंगल देवता इस लग्न कुंडली में चौथे और नवम दो अच्छे भावों के स्वामी हैं। लग्नेश सूर्य के अति प्रिय मित्र होने के कारण मंगल ग्रह इस कुंडली के योग कारक ग्रह माने जाते हैं।

पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दशम और एकादश भाव में मंगल देवता अपनी दशा -अन्तरा में अपनी क्षमता अनुसार शुभ फल देते हैं।

तीसरे, छठें, आठवें और द्वादश भाव में पड़े मंगल अशुभ हो जाते हैं। उनकी अशुभता दान पाठ करके दूर की जाती है।

अस्त अवस्था में किसी भाव में स्थित मंगल का रत्न मूंगा पहनकर उनका बल बढ़ाया जाता है।

सिंह लग्न में बृहस्पति ग्रह का फल

बृहस्पति देवता इस लग्न कुंडली में पांचवें और आठवें भाव के स्वामी हैं। बृहस्पति देवता की मूल त्रिकोण राशि (धनु) कुंडली के मूल त्रिकोण भाव में आती है। सूर्य देवता के मित्र होने के कारण वह अति योग कारक ग्रह माने जाते हैं।

पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दशम और एकादश भाव में बृहस्पति देवता अपनी दशा -अंतर्दशा में क्षमता अनुसार शुभ फल देतें हैं।

तीसरे, छठे, आठवें और द्वादश भाव में उदय अवस्था में पड़े बृहस्पति देव मारक बन जातें है और अशुभ फल देतें है परन्तु आठवां और 12वें भाव में विपरीत राज़ योग की स्थिति में आकर शुभ फल देते हैं अगर लग्नेश बलि और शुभ हो जाएँ तो।

छठे भाव में बृहस्पति नीच राशि में आ जाते है इसलिए वह विपरीत राज़ योग का शुभलाभ नहीं देते हैं।

अस्त अवस्था में बृहस्पति का रत्न पुखराज किसी भी भाव में पहना जाता है।

अशुभ बृहस्पति का दान करके उनकी अशुभता दूर की जाती है।

सिंह लग्न में शनि ग्रह का फल

शनि देव इस लग्न कुंडली में छठे और सातवें भाव के स्वामी हैं। लग्नेश सूर्य के शत्रु होने के कारण शनि देव को कुंडली का अति मारक ग्रह माना जाता है।

कुंडली के सभी भावों में शनि देव अशुभ फल देंगे इसलिए उनकी दशा-अन्तरा में उनका पाठ और दान करके उनकी अशुभता दूर की जाती है।

छठे, आठवें, और 12वें भाव में शनि देव विपरीत राजयोग में आकर शुभ फल देने की क्षमता रखते हैं परन्तु सूर्य देव के बलि होना अति अनिवार्य है।

शनि देव का रत्न इस लग्न कुंडली में नहीं पहना जाता है क्योंक वह रोगेष है।

सिंह लग्न में चन्द्रमा ग्रह का फल

चंद्र देव इस लग्न कुंडली में द्वादश भाव के मालिक हैं इसलिए इस कुंडली में चंद्र देवता अति मारक ग्रह माने जाते हैं।

कुंडली के किसी भाव में चंद्र देव अपनी दशा-अन्तरा में अशुभ फल देतें है। अपनी क्षमतानुसार अशुभ फल देते हैं।

छठे, आठवें और 12वें भाव में पड़े चंद्र देवता विपरीत राज़ योग में आकर शुभ फल देने की क्षमता रखते हैं परन्तु सूर्य देव के बलि व शुभ होना अनिवार्य है।

इस लग्न कुंडली में मोती चन्द्रमा का रत्न कभी भी नहीं पहना जाता है।

दशा-अंतर्दशा में चन्द्रमा के दान और पाठ करके उनका मारकेत्व को कम किया जाता है।

सिंह लग्न में राहु ग्रह का फल

राहु देव की अपनी कोई राशि नहीं होती। वह अपनी मित्र राशि और शुभ भावों में बैठकर ही शुभ फल देते हैं।

दूसरे, सातवें, दशम एकादश भाव में अपनी दशा अन्तरा में राहु देव शुभ फल देते हैं।

पहले, तीसरे, चौथे (नीच), पांचवें (नीच), छठें, आठवें, नवम और द्वादस भाव में राहु देव मारक ग्रह बनकर अशुभ फल देंगे। राहु का रत्न गोमेद कभी भी नहीं पहना जाता बल्कि इसका दानपाठ करके इसकी अशुभता दूर की जाती है।

सिंह लग्न में केतु ग्रह का फल

केतु देवता की अपनी कोई राशि नहीं होती। केतु देवता अपने मित्र राशि और शुभ भाव में बैठकर ही शुभ फल देते हैं।

दूसरे, चौथे (उच्च राशि), सातवें भाव में केतु देवता अपनी दशा-अन्तरा में क्षमता अनुसार शुभ फल देतें है।

पहले, तीसरे, छठे, आठवें, नवम और एकादश (नीच) और द्वादश भाव में केतु देवता मारक ग्रह बन जातें है व अशुभ फल देतें हैं।

केतु का रत्न लहसुनिया कभी भी नहीं पहना जाता बल्कि केतु का पाठ व दान करके उनकी अशुभता दूर की जाती है।

सिंह लग्न में धन योग

सिंह लग्न में जन्म लेने वाले जातकों के लिए धनप्रदाता ग्रह बुध होता है। धनेश बुध की शुभाशुभ स्थिति से, धन स्थान से संबंध जोड़ने वाले ग्रहों की स्थिति से, एवं धन स्थान पर पड़ने वाले ग्रहों की दृष्टि संबंध से जातक की आर्थिक स्थिति, आय के स्रोत तथा चल-अचल संपत्ति का पता चलता है। इसके अलावा लग्नेश सूर्य, पंचमेश गुरु एवं भाग्येश मंगल की अनुकूल स्थितियां भी सिंह लग्न वालों को धन व ऐश्वर्य प्राप्त करने में पूर्ण सहयोग करती हैं। वैसे सिंह लग्न के लिए शनि एवं बुध परमपापी है। सूर्य शुभ फलदायक है, सुखेश व नवमेश मंगल अतिशुभकारी है।

शुभ युति : गुरु + मंगल

अशुभ युति : शुक्र + मंगल

राजयोग कारक : गुरु व मंगल

सिंह लग्न में बुध मिथुन या कन्या राशि में हो तो जातक धनाधिपति होता है। लक्ष्मीजी जीवन भर उसका साथ नहीं छोड़ती।

सिंह लग्न में बुध शुक्र के घर में तथा शुक्र बुध के घर में परस्पर राशि परिवर्तन करके बैठे हो, तो ऐसा जातक बहुत भाग्यशाली होता है तथा खूब धनवान बनता है।

सिंह लग्न में मंगल मेष या वृश्चिक राशि का हो तो जातक अल्प प्रयत्न से ही बहुत धन कमाता है। ऐसा व्यक्ति धन के मामले में भाग्यशाली कहलाता है।

सिंह लग्न में बुध मंगल के घर में मंगल बुध के घर में राशि परिवर्तन करके बैठे हो तो जातक महाभाग्यशाली होता है।

सिंह लग्न में शुक्र यदि केंद्र-त्रिकोण में हो तथा बुध स्वगृही हो तो जातक कीचड़ में कमल की तरह खिलता है अर्थात सामान्य परिवार में जन्म लेकर भी करोड़पति बनता है।

सिंह लग्न में सूर्य लग्नस्त हो तथा गुरु व मंगल से दृष्ट हो तो जातक महा धनी होता है।

सिंह लग्न में पंचमस्थ स्वगृही बृहस्पति हो तथा लाभ स्थान में चंद्रमा, मंगल हो तो जातक महालक्ष्मीवान होता है।

सिंह लग्न में पंचम बृहस्पति तथा लाभ स्थान में बुध स्वगृही हो तो महालक्ष्मी योग बनता है। ऐसा जातक बहुत धनवान होते हुए धनशाली व्यक्तियों में अग्रगण्य होता है।

सिंह लग्न में सूर्य मिथुन राशि में हो तथा बुध लग्न में सिंह राशि में हो तो जातक शत्रुओं का नाश करते हुए स्वअर्जित धन लक्ष्मी को भोगता है।

सिंह लग्न में लग्नेश सूर्य, धनेश बुध व भाग्येश मंगल अपनी-अपनी उच्च या स्वराशि में स्थित हो तो जातक करोड़पति होता है।

सिंह लग्न में द्वितीय स्थान में राहु, शुक्र, मंगल और शनि की युति हो तो जातक अरबपति होता है।

सिंह लग्न में धनेश बुध यदि आठवें हो तथा सूर्य लग्न में हो तो जातक को भूमि में गड़े हुए धन की प्राप्ति होती है अथवा लाटरी से रुपया मिल सकता है।

सिंह लग्न में सूर्य शुक्र के नवांश में हो तो जातक व्यापार से धन कमाता है।

सिंह लग्न में मंगल उच्च का हो तथा सूर्य, चंद्र, गुरु उसे देखते हो तो जातक धन सुख एवं वाहन से परिपूर्ण जीवन व्यतीत करता है।

सिंह लग्न में लग्नेश लग्न में हो तथा दशमेश चतुर्थ में एवं चतुर्थ भाव का स्वामी दशम भाव में हो तो जातक उच्च प्राप्त करता है एवं आर्थिक दृष्टि से बहुत संपन्न बनता है।

सिंह लग्न में सूर्य, मंगल, बुध यदि लाभ भवन में मिथुन राशि में स्थित हो तो जातक बहुत धनाढ्य होता है।

सिंह लग्न में रत्न

रत्न कभी भी राशि के अनुसार नहीं पहनना चाहिए, रत्न कभी भी लग्न, दशा, महादशा के अनुसार ही पहनना चाहिए।

लग्न के अनुसार सिंह लग्न मैं जातक माणिक, पन्ना, मूंगा, और पुखराज रत्न धारण कर सकते है।

लग्न के अनुसार सिंह लग्न मैं जातक को हीरा, नीलम और मोती रत्न कभी भी धारण नहीं करना चाहिए।

सिंह लग्न में माणिक रत्न

·  माणिक धारण करने से पहले – माणिक की अंगूठी या लॉकेट को शुद्ध जल या गंगा जल से धोकर पूजा करें और मंत्र का जाप करके धारण करना चाहिए।

·  कौनसी उंगली में माणिक धारण करें – माणिक की अंगूठी को अनामिका उंगली में धारण करना चाहिए।

·  माणिक कब धारण करें – माणिक को रविवार के दिन, रवि के होरे में, पुष्यनक्षत्र को, या सूर्य के नक्षत्र मघा नक्षत्र, पूर्वा फ़ाल्गुनी नक्षत्र, उत्तरा फ़ाल्गुनी नक्षत्र, पुष्यनक्षत्र को में धारण कर सकते है।

·  कौनसे धातु में माणिक धारण करें – तांबे, पंचधातु या सोने में माणिक धारण कर सकते है।

·  माणिक धारण करने का मंत्र – ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः। इस मंत्र का जाप 108 बार करना चाहिए।

·  ध्यान रखे माणिक धारण करते समय राहुकाल ना हो।

सिंह लग्न में पन्ना रत्न

·  पन्ना धारण करने से पहले – पन्ने की अंगूठी या लॉकेट को शुद्ध जल या गंगा जल से धोकर पूजा करें और मंत्र का जाप करके धारण करना चाहिए।

·  कौनसी उंगली में पन्ना धारण करें – पन्ने की अंगूठी को कनिष्का उंगली में धारण करना चाहिए।

·  पन्ना कब धारण करें – पन्ने को बुधवार के दिन, बुध के होरे में, बुधपुष्य नक्षत्र को, या बुध के नक्षत्र अश्लेषा नक्षत्र, ज्येष्ठ नक्षत्र, और रेवती नक्षत्र में धारण कर सकते है।

·  कौनसे धातु में पन्ना धारण करें – सोना में या पंचधातु में पन्नाधारण कर सकते है।

·  पन्ना धारण करने का मंत्र – ॐ बुं बुधाय नमः। इस मंत्र का जाप 108 बार करना चाहिए।

·  ध्यान रखे पन्ना धारण करते समय राहुकाल ना हो।

सिंह लग्न में पुखराज रत्न

·  पुखराज धारण करने से पहले – पुखराज की अंगूठी या लॉकेट को शुद्ध जल या गंगा जल से धोकर पूजा करें और मंत्र का जाप करके धारण करना चाहिए।

·  कौनसी उंगली में पुखराज धारण करें – पुखराज की अंगूठी को तर्जनी उंगली में धारण करना चाहिए।

·  पुखराज कब धारण करें – पुखराज को गुरुवार के दिन, गुरु के होरे में, गुरुपुष्य नक्षत्र को, या गुरु के नक्षत्र पुनर्वसु नक्षत्र, विशाखा नक्षत्र, पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र में धारण कर सकते है।

·  कौनसे धातु में पुखराज धारण करें – सोने में या पंचधातु में पुखराज रत्न धारण कर सकते है।

·  पुखराज धारण करने का मंत्र – ॐ बृ बृहस्पतये नम:। इस मंत्र का जाप 108 बार करना चाहिए।

·  ध्यान रखे पुखराज धारण करते समय राहुकाल ना हो।

सिंह लग्न में मूंगा रत्न

·  मूंगा धारण करने से पहले – मूंगे की अंगूठी या लॉकेट को गंगाजल से अथवा शुद्ध जल से स्नान कराकर मंत्र का जाप करके धारण करना चाहिए।

·  कौनसी उंगली में मूंगा धारण करें – मूंगे की अंगूठी को अनामिका उंगली में धारण करना चाहिए।

·  मूंगा कब धारण करें – मूंगा को मंगलवार के दिन, मंगल के होरे में, मंगलपुष्य नक्षत्र को या मंगल के नक्षत्र मृगशिरा नक्षत्र, चित्रा नक्षत्र या धनिष्ठा नक्षत्र में धारण कर सकते है।

·  कौनसे धातु में मूंगा धारण करें – मूंगा रत्न तांबा, पंचधातु या सोने मे धारण कर सकते है।

·  मूंगा धारण करने का मंत्र – ॐ भौं भौमाय नमः। इस मंत्र का जाप 108 बार करना चाहिए।

·  ध्यान रखे मूंगा धारण करते समय राहुकाल ना हो।

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